शनिवार, मई 15, 2010

नियति feb 99

नियति

तुम ढूढ़ते रहे धूल में आसमान के टुकडे

गैरों की भीड़ में अपनापन तलाशते रहे

दोस्तों को ठोकर मार जो आये थे तुम॥

-------------------------------------

तुम्हे दर्द मिला और तन्हाई भी

क्यूँ की प्यार की कद्र तुमने कभी ना जानी

-------------------------------------

रास्तों की धूल फांकने की आदत थी तुम्हे

इसीलिए आशियाने कभी तुम्हे रास ना आये

-------------------------------------

तुम सूखे गले से मल्हार गाते रहे

और जब बरखा आई!!!!!!!!!

तुम्हारा घर छोड़ हर जगह बादल बरसे....

-------------------------------------

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें